हमारे देश के लोग अलग-अलग बीमारियों से ग्रस्त हैं। जिनमें आती हैं शारीरिक बीमारियाँ, मानसिक बीमारियाँ, और एक ख़ास तरह की बीमारी- जिसकी जानकारी मुझे समाज में काफ़ी समय बिताने के बाद हुई है। यह बीमारी हमारे समाज में काफ़ी समय से हैं और इस बीमारी की ख़ास बात यह है कि जहाँ बाकि बीमारियाँ अपने आप हो जाती हैं, यह स्वयं चुनी जाती है। और तो और जहाँ बाकि बीमारियों के होने का शोक मनाया जाता है, इसके होने का कई लोग घमंड करते हैं, और खुदको होशियार समझते है।
इस बीमारी को क्या नाम दिया जाए, इस बात पर कुछ साइंटिस्ट्स एक अँधेरे कमरे में छुप कर अध्ययन कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि अगर वो बाहर निकले और इस बीमारी से ग्रस्त लोगों ने उन्हें देख लिया तो उन्हें सम्मान के साथ जेल पहुँचा देंगे, और अगर ज़्यादा ही विनम्र लोग मिल गए तो हो सकता है उनका मिलाप सीधा ईश्वर से ही करवा दें।
ख़ैर जब तक हमारे साइंटिस्ट्स बीमारी के नाम के बारे में सोचते हैं, मैं आपको इस बीमारी के कुछ लक्षण एवं इसके प्रकार बता देता हूँ जो की मुझे मेरे खास एवं गुप्त सूत्रों से पता चले है। आप चिंता न करें मेरे सूत्र भी उन साइंटिस्ट्स के साथ एक अँधेरे कमरे में छुपे हैं, सुरक्षित और सेप्टिक टैंक से कहीं दूर।
इस बीमारी का पहला लक्षण है की ये किसी भी यंत्र से नापी नहीं जा सकती। जैसे तापमान के लिए थर्मामीटर होता है, वैसा इसके लिए कुछ नहीं है, और न ही बनाया जा सकता है। आप सिर्फ़ इस बीमारी से ग्रस्त लोगों का आचरण देखकर ही अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उन्हें ये बीमारी है। इसका दूसरा लक्षण ये है कि इस बीमारी से ग्रस्त लोग कभी यह नहीं मानेंगे की उन्हें ये बीमारी है। इसका तीसरा लक्षण ये है कि ये अलग-अलग लोगों में अलग तरीके से व्यवहार करती है, अर्थात इसका कोई एक इलाज होना काफ़ी मुश्किल है।
इस बीमारी के रूप तो कई हैं, परंतु यह मुख्य रूप से दो प्रकार की है। इसका एक वेरिएंट शरीर पे काम करता है और एक मस्तिष्क पे काम करता है। पहले हम शारीरिक वेरिएंट की बात कर लेते हैं। शारीरिक वेरिएंट के मुख्य लक्षण हैं, कमज़ोर आँखें, कान, दिमागी कमज़ोरी, एवं गूँगापन।मैं आपको उदाहरण द्वारा समझाना चाहूँगा।
पहला उदाहरण: कल्पना कीजिए एक जंगल की। भूरे पेड़ और उनकी शाखाओं पर हरियाली, उस हरियाली में चहचहाते पक्षी, गिलहरियां और अनेकों प्रकार के जीव। इन घने पेड़ों के बीच में एक साफ़ सा तालाब। इतना साफ़ की आप तालाब की सतह पर पड़े पत्थर देख पाएंगे। तालाब में तैर रही मछलियाँ। और हाथी, हिरन, बाघ और भेड़िये पी रहें तालाब के किनारे पानी। यहाँ कुछ लोग अपने यन्त्र लेकर आते हैं, और कहते हैं कि यहाँ पेड़ काट कर जगह बनाएंगे, माइनिंग करेंगे और डेवलपमेंट लाएंगे। जब ऐसा होता है तो काफ़ी लोग सुन नहीं पाते। आख़िर जंगल दूर है तो सुनने में मुश्किल तो होगी ही। बाक़ी जो कुछ लोग वहाँ होते हैं, उनमें से कई को दिखता ही नहीं है कि पेड़ कट रहे हैं। जो बीमार नहीं है वे अगर उनसे पूछ ले कि ये क्यों कर रहे हैं, जवाब मिलता है कि यहाँ काटेंगे, तो कहीं और भी पेड़ लगाए जाएँगे।लगाने का मतलब पौधे लगा कर उन्हें अपने हाल पर छोड़ देना।
दूसरा उदाहरण: कल्पना कीजिये एक पढ़ी-लिखी स्त्री की। एक छोटी बालिका की और एक बुज़ुर्ग महिला की। कल्पना कीजिऐ उस लड़की के बालपन की- उस पढ़ी लिखी स्त्री के सपनों की, और उस बुज़ुर्ग महिला की शांति की। कुछ लोग आते हैं और ये सब छीन लेते हैं- उन्हें बस मांस का टुकड़ा समझ कर। कई महिलाएं चुप रहती हैं- समाज के धिक्कार से डर कर। और कुछ जो बोलती हैं उनसे इस बीमारी से ग्रस्त लोग सवाल करते है “कहाँ थी?”, “ क्या शरीर ढका था?”, “क्या यह लड़की सही थी?” कुछ लोग जो बीमार नहीं हैं वे सवाल करते हैं न्याय व्यवस्था से, और इंसाफ़ की मांग करते हैं। और उन्हें मिलता है- समय और एक लम्बा इंतज़ार इंसाफ़ का।
तीसरा उदाहरण: कल्पना कीजिऐ रात की- रात में कुछ घरों की, उन घरों के एक कमरे में जलती रौशनी की, और उस रौशनी के पास पढ़ते छात्र की। कल्पना कीजिऐ उस छात्र की भविष्य के लिए उम्मीद की। अब कल्पना कीजिऐ कि उस पेपर की जिसपर उसने अपने भविष्य की उम्मीद लगाई, उसकी खुले आम होती हुई नीलामी की। जब यह होता है तो वह छात्र जिसका लक्ष्य और सपना बर्बरता के साथ छीन लिया जाता है, वह इस दुनिया को स्वयं त्याग देता है।इसमें उसकी मदद करती है रस्सी, ज़हर और डेवलपमेंट में लाई गई ऊँची बिल्डिंग्स। जब यह होता है, तो इस बीमारी से ग्रस्त लोग यह देखकर अनदेखा कर देते हैं- सुनकर अनसुना कर देते हैं। जो बीमारी से ग्रस्त नहीं होते, वे कुछ सवाल करते हैं, और उन्हें जवाब मिलता है जो अंग्रेजी में हमने सीखा- "साइलेंस इज़ गोल्डन'।
साइंटिस्ट्स ने मुझे अभी मेरे सूत्रों द्वारा बताया कि यह बीमारी के दो वेरिएंट नहीं हैं, बल्कि यह शारीरिक और मानसिक स्थिति पर असर एक साथ करती हैं, और मैंने अपने उदाहरणों में इनका मानसिक असर भी लिख दिया है। कटते पेड़ न देख पाना और अपने अलावा जींवो की गुहार न सुन पाना, यह इस बीमारी का लक्षण है और नाम है "स्वार्थ"। महिलाओं को सुरक्षित न रखपाना और उनके लिए आवाज़ न उठाना, और कुछ का उन्हीं पर सवाल उठाना, यह भी एक लक्षण है और नाम है "कायरता और मानसिक नपुंसकता"। छात्रों का जीवन बिखरते देखना और अनसुना करना, जो आवाज़ उठाये उसे देश के खिलाफ कहना भी एक लक्षण है- नाम है "दया और मानवता की मृत्यु"। जो व्यक्ति इन सब से ग्रस्त है, जो असहाय, लाचार, मजबूर और कमज़ोर को नही देख सकता, बल्कि उसे “फॉरेन प्रोपगैंडा” बताता है, यह भी एक लक्षण है- नाम है "अंधभक्ति एवं चापलूसी"।
इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति आँखों से कम देख पाता है और कानों से कम सुन पता है। जो देखता और सुनता है, अगर वो उसके विचारों या पसंदीदा गुट से अलग हो, तो उसे या तो विदेशी चाल बताता है या बेवक़ूफ़ी जो की उसकी मानसिक दुर्बलता है। यह बीमारी व्यक्ति को नींद में भेज देती है- गहरी नींद- जो होती है समाज के सत्य, दुःख और परेशानियों से दूर। परंतु साइंटिस्ट्स कह रहे हैं कि हमें दुखी होने की ज़रूरत नही है- आखिरकार कुम्भकरण भी जगा दिया गया था, तो यह बीमार, सोते हुए लोग तो कुछ भी नही हैं।
उन्होंने मुझे समझाया कि इस बीमारी के लिए कोई चश्मा नहीं बन सकता और न ही कोई हियरिंग एड्स बन सकते हैं। इसी लिए हमें करना होगा बड़ा प्रयास- सच की क्रांति जब फैलेगी हर गली और हर घर, तो मुश्किल होगा न देखना। सच गूँजेगा जब हर उस गले से जिसे दबाने की कोशिश हो रही हैं, तो मुश्किल होगा न सुन पाना। चेतावनी मिली हैं कि कहने वालों की आवाज़ दबाई जाती हैं, और जो जमीन पे उतरकर सवाल करते हैं, उन्हें देनी पड़ती हैं कीमत लहू में। परंतु जब एक-जुट गूँजेगी आवाज़- सच के लिए और अपने हक़ के लिए, तब ही होगी यह बीमारी दूर।
फ़िलहाल मामला संगीन हैं और आधे से ज़्यादा समाज अँधा, बहरा, गुंगा और अपंग हैं। पर हम उम्मीद करते हैं बदलाव की- आखिरकार एक समय में हवा में उड़ना, चाँद पर पैर रखना इत्यादि सिर्फ एक सपना थे। नामुमकिन तब तक नामुमकिन होता है जब तक हम उसे मुमकिन नहीं कर देते।
मुझे यकीन है कि एक दिन हम होंगे इस बीमारी से मुक्त- जब लोग देख पाएंगे, सुन पाएंगे, समझ पाएंगे, और बोल पाएंगे। कीमत होगी कुछ छात्रों की शिक्षा अव्यवस्था को बलि, कुछ मासूमों के लाशों की जो आए दिन निचे गिरते ब्रिज, ख़राब सड़के और अमीरों की गाड़ियों के चपेट में आ जाती हैं।
और कुछ लोग जो न्याय की जो सत्य और मानवता के लिए दे देते अपनी आहुति।
लेखक - तनवीर सिंह शेखावत।
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